टॉप सीक्रेट – By भम्मरकर

मंत्रियों के अज्ञातवास
शिवराज काबीना के मंत्री पिछले सोमवार से ही भोपाल में ही हैं। लेकिन बंगले पर मिल नहीं रहे हैं। ये संयोग ही है कि पिछले दो हफ्तों से मंत्रियों के बंगले पर भीड़ भी ज़बरदस्त जमा हो रही है। ये वो भीड़ है जो तबादलों के आवेदन लेकर पहुंची हुई है। इस पूरे हफ्ते अधिकांश मंत्री भोपाल में ही रहे, लेकिन ज्यादातर वक्त बंगले से बाहर ही बिताया। इस दौरान मंत्रीजी कहां है, ये पता करना भी खुदा तलाशने जितना कठिन है। दरअसल, तबादलों की फाइलें जल्द से जल्द निपटाना है लेकिन आवेदनों की आवक लगातार बनी हुई है। मुसीबत से बचने के लिए मंत्रियों ने अज्ञातवास के ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। बंगले से ही गायब हो जाइये, ना नौ मन तेल होगा, ना राधा नाचेगी।

शिव-ज्योति की जुगलबंदी बढ़ा रही धड़कनें
सीएम शिवराज और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच ज़बरदस्त ट्यूनिंग देखने को मिल रही है। एक-दूसरे की तारीफ का कोई मौका ये लोग नहीं छोड़ रहे हैं। सिंधिया ने जैसे ही कुछ अच्छा काम किया, तुरंत ही शिवराज का ट्वीट आ जाता है। यही सिंधिया कर रहे हैं। ऐसा करके दोनों ही मीडिया की सुर्खियां बटोर लेते हैं। फिर बीजेपी नेताओं के बीच में कानाफूसी भी शुरू हो जाती है। ये तारीफ ऐसी सुरसुरी छोड़ती हैं कि लोग मायने निकालते रह जाते हैं। भविष्य की राजनीति की तस्वीर तक उकेरी जाने लगी है। पार्टी दफ्तर में अब ये चर्चा भी हैं कि शिव-ज्योति की ट्यूनिंग और टाइमिंग से कहीं दूसरे सुर नहीं बिगाड़ दे।

खंडवा में कांग्रेस का आदिवासी कार्ड!

दिग्गजों के लोकसभा चुनाव क्षेत्र में कांग्रेस के कुछ रणनीतिकार कुछ नया प्लान कर रहे हैं। यहां होने वाले उपचुनाव के लिए इस बार किसी आदिवासी को टिकट देने की तैयारी में हैं। चूंकि ये कांग्रेसी दिग्गज अरुण यादव की परंपरागत सीट कही जाती है, इसलिए कोई दूसरा दिग्गज इस इलाके का रुख भी नहीं करता है। लेकिन इस बार कुछ आदिवासी विधायकों ने आदिवासी को टिकट देने का नया राग छेड़ दिया है। इलाके के कुछ विधायकों ने तर्क दिया है कि इस सीट के करीब 19 लाख वोटरों में से आदिवासियों की आबादी साढ़े 6 लाख है। इनके अलावा 2 से 3 लाख वोटर मुस्लिम है। जिस उम्मीदवार को साढ़े 5 लाख वोट मिल जाते हैं वो जीत जाता है। ऐसे में आदिवासी को टिकट देना फायदे का सौदा हो सकता है। इस सीट पर किसी भी पार्टी ने आदिवासी को मैदान में नहीं उतारा है, ऐसा करके कांग्रेस एक सीट झटक सकती है। यदि इस रणनीति पर काम हुआ तो अरुण यादव की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

विधायकों की शिकायत

आमतौर पर विधायक मंत्रियों की शिकायत करते हैं। लेकिन इस बार ये काम मंत्रियों ने किया है। मामला तबादलों की शिकायत का है। एक-एक विधायक ने औसतन 200 सिफारिशी लैटर भेजे हैं। शिकायत बाकायदा सीएम साहब से की गयी है। इन सिफारिशों को निपटारा मंत्रियों के लिए मुश्किल हो गया है। सिफारिशी चिट्ठियों की आमद अब भी लगातार जारी है। मंत्रियों ने तो यहां तक कहा है कि केवल विधायकों के सिफारिशों पर ही अमल किया जाए तो पूरा प्रशासनिक मशीनरी इधर से उधर हो जाएगी। हालांकि तबादलों के हर सीज़न पर ऐसा ही होता है।

लेकिन कहा ये जा रहा है कि ऐसा कहकर मंत्रियों ने अपने आप को विधायकों का कोपभाजन होने से बचा लिया है। साथ ही ये संकेत भी हैं कि विधायकों का सिफारिशें तबादलों की गारंटी नहीं हैं।

कमिश्नर की सतपुड़ा से दूरी

खबर सतपुड़ा भवन से है। यहां एक महकमे के मुखिया अपने दफ्तर ही नहीं आ रहे हैं। साहब सारे काम मंत्रालय से बैठकर निपटा रहे हैं। सतपुड़ा भवन की फाइलें भी मंत्रालय पहुंचाई जा रही है। इस महकमे के सारे डायरेक्टर इसी सतपुड़ा भवन में बैठते हैं, लेकिन कोई बात साहब से करनी है तो मंत्रालय की दौड़ लगानी पड़ती है। आलम ये है कि अफसरों से लेकर अर्दलियों तक मंत्रालय-सतपुड़ा के बीच दिन भर दौड़ रहे हैं। साहब को इस महकमे की जिम्मेदारी मिले 8-9 महीने हो चुके हैं, लेकिन एक बार भी सतपुड़ा पदार्पण नहीं किया है। साहब का कैबिन रोजाना साफ और सेनेटाइज किया जाता है। लेकिन साहब नहीं आते हैं। बता दें कि मौजूदा दौर में सबकी आस इसी महकमे से है।

कर्मचारी आंदोलन से किरकिरी

बीते दिनों हुई कर्मचारियों हड़ताल सफल रही, लेकिन प्रदर्शन फ्लॉप साबित हुआ। हड़ताल इसलिए कामयाब रही क्योंकि कर्मचारी इसमें व्यक्तिगत रूप से रुचि ले रहे थे। इसकी वजह भी ये थी कि महंगाई भत्ते मिलने में हो रही देरी से कर्मचारी ज़बरदस्त नाराज़ हैं। सभी ने पूरे समर्पण से सहयोग किया। लेकिन कर्मचारी एकता दिखाने के लिए जब नेताओं की जिम्मेदारी की बारी आयी तो सारे नेता कमजोर नजर आए। कुछ निष्ठावान पदाधिकारियों की वजह से भीड़ जुट सकी और प्रदर्शन हुआ। इसमें कर्मचारी नेताओं का योगदान रत्ती भर का भी नहीं था। ये संदेश कर्मचारी जगत में फैलने लगा है कि कर्मचारी नेता अपनी व्यक्तिगत रोटी सेंकने और नेताओं की चरण वंदना में ही लगे हैं। वे केवल अपने पद का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए पिछले कई दिनों से कोई बड़ा कर्मचारी आंदोलन नहीं खड़ा हो पाया है। निष्ठावान और भीड़ जुटाने वाले कुछ पदाधिकारी अब तेजी से चर्चाएं छेड़ रहे हैं कि निराकरण कैसे किया जाए।

दुमछल्ला…

पीसीसी चीफ के लिए एक नया दावा सामने आने वाला है। ये दावा होगा राजधानी भोपाल से। फील्डिंग तेज़ कर दी गई है। तर्क ये दिए जा रहे हैं कि नेताजी दिग्विजय सिंह के करीबी हैं और कमल नाथ के साथ काम करके उनका भरोसा भी जीत चुके हैं। दिग्गी-कमल नाथ की कॉमन पसंद वाले ये नेता अहम मिनिस्ट्री भी संभाल चुके हैं।

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Author: thehind today

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